शनिवार, 27 मार्च 2010

खटर काका एखनो मिथिला में मौजूद छैथ सिर्फ हरिमोहन झा के अभाव अछि

मिथिला में की वाकई लेखक के अकाल अछि .अगर गौरी नाथ जी के बात पर विश्वास करी त मैथिलिक पत्र पत्रिका के नव लेखक ,कथाकार ,कवि ,आलोचक नहीं भेट रहल छैन्ह .गौरी नाथ जी पिछला एक दशक स एकटा मैथिलिक पत्रिका प्रकाशित कय रहल छथि . त जाहिर अछि अहि दौर में मैथिलि में निकले वाला पत्र-पत्रिका के स्थिति और उम्र पर चिंता व्यर्थ अछि .वेब दुनिया क बढ़ल वर्चस्व में मैथिलि  साहित्य और मिथिला के सम्बन्ध में किछु छिटफुट रचना नवतुरिया क उत्साह क रूप में सामने आयल अछि .लेकिन प्रतिबधता क घोर आभाव अछि .भावुकता में उत्साह में नवतुरिया कथाकार एक झलक देखा कय कतय बिला गेला से नहि जानी .किछु रचना अंग्रेजी में सेहो भेटल ,हिंदी में मैथिलिक रचनाक अनुबाद सेहो भेटल लेकिन मौलिक रचना बहुत कम भेटल .यानी हरमोहन झा स लय क बाबा नागार्जुन तक विद्यापति स लयक वियोगी जी तक ढेरो रचनाक अनुवाद ,रचनाक चर्चा वेब पर जरूर भेटत लेकिन वर्तमान के मामला में नव साहित्यक विधा चुप अछि , त की समाज में आब हरिमोहन झा पैदा नहि लय छैथ या फिर मैथिल समाज में खटर काका अनचिन्हार भय गेल छथि .हास्य मैथिल समाज के पहचान कलिहियो छल और आईओ अछि .त किया हास्य रचना बंद भय गेल .किया आब बाबा नागार्जुन ,सीताराम झा ,मनिपदम ,सुमन जी ,मधुप जी खामोश भय गेल छैथ .की हुनकर परंपरा आब मिथिला में ख़तम भय गेल अछि .
सुधिजन कहैत छथि जे साहित्य समाज के दर्पण होइत अछि .त की मैथिल समाज अपन पुरना साहित्य के लय क अपन पहचान कायम रखता .यानी हमरा साहित्य में नव किछु नहि अछि ,लेकिन हमर साहित्य एतेक समृद्ध अछि जे एक दो पुस्त हम और अपन अतीत के गावी और महिमा मंडन कय गौरवान्वित भय सकैत छि .लेकिन अबै वाला पीढ़ी हमरा सब पर कतेक गौरब करत एकर कल्पना कैल जा सकैत अछि .पिछला २० साल में भारत में प्रचलित २०० स अधिक भाषा और साहित्य बिलुप्त भय गेल अछि .अंदाजा लगाऊ अहि तरहे मैथिलि के बिलुप्त होए में आब कतेक समय लागत .मैथिल सुधिजन हर चर्चा में जोर स कहैत छैथि जे मैथिलि इंडो आर्यन भाषा में सबस बेसी समृद्ध अछि ,एकर तुलना में ओ भोजपुरी सहित आन साहित्य के बहुत पिछडल मानय छाथिन. हुनकर तर्क छैन्ह जे मैथिलि साहित्य के अपन इतिहास छैक ,महाकाव्य छैक ,लिपि छैक ,रचनाकारक लम्बा फेहरिस्त छैक .यानी इ समृधि मैथिलि के संविधान क अष्टम सूचि में जगह जरूर डे देलक ,लेकिन इ चिंता केनाय हम छोड़ी देलहुं जे मैथिलिक हमर बोली विलुप्त भय रहल अछि .

मैथिलि में लिखबाक ,मैथिलि में बाजबाक परंपरा ख़तम भय रहल अछि तकर कारण आर्थिक सेहो अछि .प्रकाशक कहैत छैथि जे मैथिलि साहित्य के खरीदार नहि छैक .नवतुरिया कहैत छैथ जे मैथिलि बाजी क नौकरी ढूंढ़ नाय मुश्किल अछि .कवि और रचनाकार क सवाल छैन्ह जे बताऊ मैथिलि में कतेक विडियो एल्बम और फिल्म बनैत अछि .यानी मार्केट और ओकर उर्जा भोजपुरी के लोकप्रिय बनोलक अछि ओही तुलना में मैथिलि कतो नहि अछि .त की समाज अहि के लेल दोषी छैथ या रचनाकार जे समाज के आंदोलित नहि कय सकैत छैथ .देश विदेश में फैलल मैथिल समाज मिथिला क श्रेष्ठ रचना ,किछु नव खोज चाहैत छैथ .की गाम वाली नबकी कनिया सनक भोजपुरी लय स भिजल मैथिलि क गीत के नवीन रचना कही सकैत छि .
त की हमर नविन पीढ़ी समाज के टेस्ट जाने में अक्षम छैथ या फिर हमर नव उदीयमान रचनाकार के पास कोनो दमदार आईडिया नहि छैन . भय सकैत अछि जे हम कतेको उदीयमान रचनाकार स परिचित नहि भेलहु अछि या हमर खोज एखन अधुरा अछि ,लेकिन एखन तक हम वेब पर या स्टाल पर जतेक खंगालाहू अछि ओहिमे हमरा सिर्फ निराशा भेटल अछि .
परिचय के मामला में हम एतेक पिछडल छि जे अपना संसथान में काज करेवाला मैथिल स परिचय होय में हमरा सबके साल लागि जैत अछि .हमर हिन् भावना सार्वजानिक जगह पर  एक दोसरा स मैथिलि में गप्प करबा स रोकैत अछि .तखन एकर निदान की अछि .संपर्क बढेबाक पहल बंद अछि तखन नव रचना क कल्पना केना भय सकैत अछि .विश्वास करू मैथिल समाज में अइयो कतेक खटर काका मौजूद छैथ ,कतेको गोनू झा घूर तर लोक के मनोरंजन कय रहल छैथ .इ हमरा सबहक दायित्वा अछि जे हुनकर प्रतिभा के समाज के बीच लाबी .कोनो जरूरी नहि छैक जे अहि के लेल हमरा हरिमोहन झा सनक लेखनी चाही ,कोनो जरूरी नहि छिक जे मिथिला के करून गाथा के लेल मधुप जी के याद करी .इ गाथा हमहू टुटल फूटल भाषा में लिखी सकैत छि .सिर्फ समृद्ध भूत पर वर्तमान और भविष्य क आधार मजबूत नहि कायल जा सकैत अछि .परम्परा के आगा बढैबा में कतेको नव रचनाकार के योगदान छैन्ह ,लेकिन अहि दिशा में और प्रयासक अपेक्षा अछि .
खटर काका एखनो मिथिला में मौजूद छैथ सिर्फ हरिमोहन झा के अभाव अछि

1 टिप्पणी:

  1. सार्थक चिंतन करैत आलेख । आहाँक चिंता उचित अछि की मैथिली में नव साहित्यकार आ लेखकक अभाव भ रहल अछि । किछ आर्थिक कारण भ सकैत अछि, लेकिन हमरा त बुझा रहल अछि जे इ इच्छाशक्ति के अभाव इंगित क रहल अछि । नीक साहित्य के सब जगह प्रशंसा भटैत छैक चाहे ओ कोनो भा में किये न हुये । आवश्यकता अछि एकता सार्थक आ सम्मिलित प्रयास के । आभार

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